Sunday, November 7, 2010

FORGIVE & FORGET


Anger is a hanger,

It will hang u high in a no man's land,

with clutters of sadness & eyes full of tears & sand.


Just relax & stay cool for a while,

& nourish yourself with a beautiful smile.


Remember the magical words "forgive & forget "-

Forgive those who cheated u,

& forget the event that defeated u.

I know my dear –Its easy to say, but very hard to try,

But it is far better than feeling lonely and giving a huge cry.



Believe in the power of "NOW" my dear,

no past, no future, nor any kind of fear.

Today is the day that no one can take away !

so live it to the fullest and make it out a gr8 day.


--Aanchal Choudhary




Saturday, September 18, 2010

महेंगाई




हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महँगाई |
खोया और पनीर तो 
पाव भर भी ले न सकी , 
सोनारों के तराजू से तोल्वा 
मिलीग्राम में ले कर आई I
काजू -किशमिश , 
बादाम-अखरोट लेने तो कल 
मैं बैंक से लोन ले कर आई I
क्या खाऊं आलू -बैगन ,
परवल , भिन्डी या तरोई , 
अब तो मैं सीधे 
घास -फूस पर उतर आई I
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महँगाई |
रिक्शा , ऑटो और taxi 
के भाड़ों पर भी 
महँगाई की रंगत छाई I
इस बढ़ते हुए भाड़े ने मेरे 
आने -जाने पर लगाम लगाई I
घरेलु खर्चे , अम्म्मा की दवाई , 
बीवी की फरमाईशें 
और बच्चों की पढ़ाई ,
ने एक आम आदमी 
की रातों की नींदें उड़ाई I
बचा -कूचा चैन ले जाती है 
अपने घर के लिए 
जाने वाली मासिक EMI !
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महँगाई |
मेहमानों को देख कर लगे
कि मानो संकट की घड़ी आई ,
कहाँ से लाऊँ चाय-नाश्ता
या फिर कोई छेने की मिठाई I
सप्ताहांत में क्या जाऊं 
कहीं घूमने फिरने ,
सिनेमा से मन बहलाने ,
खुद ही गुनगुना लेती हूँ चन्द गाने,
ह़र तरफ बढ़ते दामों ने 
बाजारों में है आग लगाई I
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महँगाई |
बढ़ती हुई महेंगाई,
बुंदेलखंड, विधर्भ जैसे 
अनेक प्रान्तों के किसानों 
पर भी मुसीबतें लाई |
लाखों किसानों की व्यथा 
भुकमरी, उत्तेजना उपद्रव व 
आवेश में  उभर कर आई I
दुखी, त्रस्त और क़र्ज़ में डूबे 
किसान ने ख़ुदकुशी को 
आखरी रह मान अपनी जान गवाई I
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महेंगाई I
कहने को तो शासन में 
आम आदमी की सरकार है आई ,
पर इस आम आदमी की सरकार ने
दी कमर तोड़ बढ़ती महेंगाई I
नौकरी पेशा होते हुए भी इस 
महेंगाई से मेरी सांस रुक आई ,
तो फिर एक बार सोचिये मेहरबान , 
कि गरीबों पर मेहेंगाई ने 
क्या –क्या गाज गिराई |
दोस्तों ,अपनी इस स्व-रचित कविता 
के माध्यम से मैं अपनी यही संवेदना 
आप तक प्रस्तुत करने आई, 
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महेंगाई I

---------आँचल चौधरी













Monday, March 8, 2010

याद
क्या बतलाऊं तुम्हे कि
तुम्हे कितना याद करती हूँ I

हर आहट पर ठहर जाती हूँ ,
कि लगता है तुम आने वाले हो I
शाम होते ही सवार जाती हूँ ,
कि लगता है तुम आने वाले हो I

पलके भी नहीं झपंकने देती हूँ,
कि लगता है तुम आने वाले हो I

रात सोते हुए हुड़क जाती हूँ
कि लगता है तुम आने वाले हो I

क्या बतलाऊं तुम्हे कि
तुम्हे कितना याद करती हूँ I


हर ज़र्रे से पुचा करती हूँ
कि क्या तुम आने वाले हो I
कण -कणमें ढूंढा करती हूँ
कि क्या तुम आने वाले हो I
सूरज की पहली किरण से सवाल करती हूँ
कि क्या तुम आने वाले हो I
रात की ख़ामोशी में सोचा करती हूँ

कि क्या तुम आने वाले हो I


क्या बतलाऊं तुम्हे कि
तुम्हे कितना याद करती हूँ I

Saturday, March 6, 2010

भीगी बरसात में

भीगी बरसात में
बादल गरजा, बिजली कडकी , भीगी मै बरसात में I
घटाओं ने रुख बदला और आ गये हम तुम साथ में I
भीनी फिजाओं में उड़ता आँचल पकड़ा तुमने हाथ में I
यू ही शर्मा जाती हूँ ये सोच कर कि कैसे तुम पास
आओगे पहली मुलाकात में I

कैसा ये सावन छाने लगा है, कि अरमान मचलते हैं ऐसे हालात में I
कैसे तुम्हे पास बुलाऊं कि मन की शेरनी बैठी है इसी घात में I
ये कैसा जादू है तुम्हारा की ढूढने लगी हूँ तुम्हे हर बात में I
तेरी याद में इस कदर डूबी हूँ कि जैसे अँधेरा रात में I


बादल गरजा, बिजली कडकी , भीगी मै बरसात में I
घटाओं ने रुख बदला और आ गये हम तुम साथ में I

आँचल चौधरी

Friday, February 26, 2010

Thoughtful/Sarcastic : जानलेवा फ्लू का वायरस

ऐसा छाया जानलेवा फ्लू का वाइरस,
कि मॉल्स-मल्टीप्लेक्स सब हो गये नीरस,
यदि आपको गलती से भी गई खासी,
तो समझो सारी जनता उलटी दिशा भागी |

डॉक्टरों की तो है चांदी, बरस रही है फीस,
एक रूपया का मास्क बिकता है रूपया बीस,
कितना भी कोई करीबी हो, ये ज़रूर कहेगा
कि "ओह, टेक केयर, प्लीज डू नॉट स्नीज",
हर कोई ढूंढें ,कि बस मिल जाये
कोई रुमाल, टिश्यू या पुरानी कमीज़ |
मुह पे बांध कर तौबा करें कि
' ओहो,ये जानलेवा फ्लू , उफ़ ये क्या चीज़ |

बच्चे- बूढ़े सभी ने
लगाये हैं मास्क के नकाब,
मनो कह रहें हों कि लेट जाईये
ऑपरेशन करने को तैयार हैं जनाब,
न्यूज़ चैनल्स दिन-रात बस लगाते रहते हैं
वायरस से होने वाली मौतों का हिसाब ,
लेकिन गौर फरमायें तो पाएंगे कि
हालात वाकई हैं ख़राब ---

देश में पड़ रहा सूखा है,
हर तीसरा किसान सोता भूखा है,
महँगाई का काँटा आसमान छूता है,
आम कर्मचारी संशोधित तन्खा लेने से चूका है |

पाकिस्तानी घुसपैठ से हम पहले ही परेशांन हैं,
ऊपर से आया ये जीवडून बना हैवान है,
बेनकाब घूम रहे आतंक -वादियों
को ढूँढना  क्या आसान है?
जो अदृश्य वायरस बन बैठा नया मेहमान है |

मंदी के इस दौर में
बीमार होने का अतिरिक्त भार
आखिर कौन उठाएगा,
ये वायरस तो आज है,
कल परसों में चला ही जायेगा |
पर इन सब मुसीबतों से
हमें कौन बचायेगा  ?