Sunday, October 29, 2017

नकाब

जू ही पहर बदलेगा , पहरेदार गद्दार बनेंगे ,
तेरी लाश पर से गुज़र कर , सरदार बनेंगे |

मुखौटे पर मत जाना , तुम्हें  मौके पर नज़रअंदाज करेँगे ,
तुम्हारा खज़ाना लूट कर , नुमाईश बिंदास करेंगे |

पहचान लेना हरकतों से , चुपके से दिल में वास करेंगे ,
किनारा मिलते ही तुम्हारा भरी मैफिल में उपहास करेंगे |

स्वार्थ के लिए , कथनी और करनी में भेदभाव करेंगे ,
ज़रूरत पड़ने पर बड़ी ही सहजता से अलगाव करेंगे |


तुम्हारा सब कुछ छीन कर तुम्हें बर्बाद करेंगे,
तुम्हारे लहू से दिया जलाकर अपना घरोंदा आबाद करेंगे |

पलकों पर बिठाने का सपना दे कर , तुम्हारा इस्तेमाल करेंगे ,
जब मतलब निकल जाये , तो दूर से ही इस्तकबाल करेंगे |

मुनासिफ है कि पहले ही सतर्क हो जाओ ,
किसी को कभी इतना मौका मत दो ,
पहली गलती से सबक ले कर हट जाओ ,
कम से कम अपने आप को तो धोखा मत दो |

आँचल चौधरी 

Friday, June 2, 2017

हो उद्देश्य जीने का




एक तरफ मेरे सपने मुझे सोने नहीं देते,
फौलाद से मेरे इरादे मुझे रोने नहीं देते |

लक्ष्य की दूरियां मुझे अब जीने नहीं देती ,
यह ख्वाईशें अब ज़हर भी पीने नहीं देती |

कब तक यूं रस्मों और रिवाज़ों से लड़ती
रहूं मेरे "मालिक ",
रोज़ अर्ज़ियाँ डाली है -" बंगला साहिब ",
"मक्का" व "शिवालिक " |

आखों से आँसूं छलकने को बेताब बैठे हैं ,
पर उम्मीद हम अपने आप से लगाएं बैठे हैं |

थोड़ा सा बस और चल लूँ तो शायद सहर  हो जाये ,
एक मुस्कराहट से मेरी तकलीफों पर कहर हो जाये |

रातों को नींद अब अलविदा कर देती हैं,
अथक आशायें  फिर भी उठ, चलने देती हैं |

कोई शिरकत तो करे ख़्वाबों की महफ़िल में,
दुआयें शामिल कर लेंगी उन्हें अपनी मंज़िल में |

सिर्फ औपचारिकता में क़ैद होना तो नहीं है ज़िन्दगी,
हो उद्देश्य जीने का, तो जीवन हो जैसे -"खुदा की बंदगी" |

 आँचल चौधरी






Saturday, May 27, 2017

घर ज़रूर चले जाना





जब भी मौका मिले,
घर ज़रूर चले जाना,
घर जा कर माँ  के
आँचल में सो जाना,
उनको थपकी देते हुए
नींद में खो जाना ,
सारी दौलत एक तरफ,
तुम हो उनका खज़ाना |

शाम को उनका मन पसंद
गाना गुनगुनाना,
जब मौका मिले तो प्यार से
बाबा को गले लगाना,
तुम बस उनके पास ही हो ,
यह एहसास दिलाना ,
जब भी मौका मिले तो
घर ज़रूर चले जाना |

बेवजह ही उन्हें देखकर
मंद-मंद मुस्कुराना,
तुम्हारी आँखें हैं
उनके लिए पूरा ज़माना,
वक़्त निकाल उनके साथ
खूब खिलखिलाना,
जब भी मौका मिले,
घर ज़रूर चले जाना |

जहाँ भी रहो, जो भी  करो,
बस उनका सम्मान बढ़ाना ,
ध्यान रहे उनकी आँखों में
कभी आँसू ना लाना ,
क्षणिक है ये जीवन,
इसे व्यर्थ की भागदौड़ में
मत गवाना ,
जब भी मौका मिले,
घर ज़रूर चले जाना |


आँचल  चौधरी



Wednesday, May 17, 2017

ये दिल क्या करे

गर यादें आज से ज़्यादा सुनहरी लगें , तो ये दिल क्या करे?

कल के सूखे पत्ते गुलाब से महकने लगे, तो ये दिल क्या करे?

यथार्थ को छोड़ कृर्तिमता दिलचस्प लगे , तो ये दिल क्या करे?

हक़ीक़त से ज़्यादा ख़्वाबों में बातें  होने लगे, तो ये दिल क्या करे?


जब इंतज़ार में उम्मीद के बदले खलिश लगे,  तो ये दिल क्या करे?

सब जानते हुए भी कोई अंजना लगे , तो ये दिल क्या करे?

साथ की बजाय दूरियों मिलने लगे, तो ये दिल क्या करे?

आप जिसकी मंज़िल थे , वो महफ़िलों में शिरकत करे , तो ये दिल क्या करे?



जब उनकी बातों में भी ख़ामोशी लगने लगे, तो ये दिल क्या करे?

स्वर जब न  सुनने  की उम्मीद से खामोश हो जाये, तो ये दिल क्या करे?

आँचल में  सोने वाले जब दामन बचा गुजरने लगे , तो ये दिल क्या करे?

साथ चलने का दम भरने वाले , रास्ते बदले , तो ये दिल क्या करे?

जो कभी सिसक उठते थे, आज आपकी उदासी पे हसें, तो ये दिल क्या करे?



आखों में जब ख़ुशी के बदले बौछार बहे , तो ये दिल क्या करे?

तन सोना चाहे और मन जागना चाहे , तो ये दिल क्या करे?

सबसे दूर कहीं अँधेरे सा खोना चाहे , तो ये दिल क्या करे?

जब मौत ज़िन्दगी से बेहतर लगने लगे , तो ये दिल क्या करे?


आँचल चौधरी