Sunday, December 2, 2012

बिजली उत्पादन

 बिजली उत्पादन

बिना बिजली के गर्मी से बुरा हाल था,
दिन के उजाले में भी अँधेरे सा काल था ।
ऐसे हालात में हम न सूली पर चढ़ेंगे,
पहले क्या कभी पढ़े थे, जो अब पढेंगे ।

तब सबने अपनी अपनी गुहार लगायी,
और क्लास बंक करने की बात सामने आई ।
निर्णय लेने में थोड़ा ज्यादा ही वक़्त लगाया,
तभी पसीने से तर शिषक क्लास में आया ।

सब तितर बितर होकर
अपनी सीट की ओर भागे,
कुछ साथी तो अभी आये थे,
तो कुछ नींद से जागे ।
सब एक सुर में बोले कि
"सर, न पढ़ाएं, आज है बहुत गर्मी ,
" थोडा पढ़ लो, मै छोड़ दूंगा जल्दी ",
बोल शिषक ने दिखाई नरमी ।

फिर सर जी ने कुछ चित्र बनाये,
पर अँधेरे में वो चित्र विचित्र नज़र आये ।
"सर कुछ दिखाई नहीं दे रहा, हमे आप जाने दो ",
सर बोले " आगे आ कर बैठो, यूँ हमे न लपेटो "।

"सर, टाइम हो गया, अब तो हम जायें ",
सब यही सोच रहे थे कि इन्हें कैसे मनाये ।
सर ने समझाया कि "बाहर पेहरे सख्त हैं ,
थोड़ा और पढ़ लो अभी अटेंडेंस में वक़्त है "।

इस दिक्कत को हम कैसे सुलझाए,
कब तक यूँ ही क्लास बंक लगायें ।
किस से करें ये शिकवे -शिकायत,
ये तो है पूरे देश प्रदेश की हालत ।

चलो अब हम ही कुछ मिल कर करते हैं,
किसी नए तरीके से बिजली उत्पादन करते हैं ।
किसी नए तरीके से बिजली उत्पादन करते हैं ।

Monday, November 5, 2012

तेरा ख़याल

जाने क्या बात है  कि  तेरा ख्याल  मेरे ख्याल  से जाता नहीं ,
यूँ ही तो हर किसी के चेहरे  में  चांद  नज़र आता  नहीं ,
न  कोई महफ़िल या कोई और शख्स दिल को भाता नहीं ,
तेरी आवाज़ के सिवा  किसी और का स्वर अब  लुभाता नहीं ,
तेरे ज़िक्र से ही गुदगुदा के खुद को चादर में यूँही छुपाता नहीं ,
कुछ तो है बात ,वर्ना तेरी याद में दिल यूँ पलके बिछाता  नहीं ।
 
क्यूँ याद आती है दिव्यरूपी आशीष स्वरुप तेरे प्यार की ,
हर पल बढती जा रही है ख़ुमारी मेरे यार की ,
वो बातों में मनाना ,किसी बात पे इनकार की ,
कभी मीठे सी बात तो कभी प्यारी टकरार की,
तुमसे मिलने का सुरूर, वो घडी इज़हार की,
बस देर है तो तेरी हाँ  की , तेरे ऐतबार  की ।


आँचल  चौधरी 

Monday, September 17, 2012

तुम मेरे क्या हो ?





तुमसे कैसे कहूँ कि तुम मेरे क्या हो !
होटों पर जो खिल जाये वो हसी हो,
बालों में जो हिल जाये वो कली हो,
नींदों को जो सजायें वो सपना हो,
हाले- दिल जिसे सुनाये वो अपना हो |

तुमसे कैसे कहूँ कि तुम मेरे क्या हो !
कभी पास कर तुम हसातें हो,
तो पल मिएँ दूर जा कर सताते हो,
जो रूठ जाऊं तुमसे तो मनाते हो,
आपनी की बातों के जाल में फसातें हो |

तुमसे कैसे कहूँ कि तुम मेरे क्या हो !
कभी दूर देखूं तो तुम पास हो,
कभी पास देखूं तो तुम एक एहसास हो,
धरती पर देखूं तो तुम आकाश हो,
दिल जिसे गुन-गुनाए वो सुरीला साज़ हो |

तुमसे कैसे कहूँ कि तुम मेरे क्या हो !
मैं एक मोबाइल तो तुम मेरे सिम हो,
मैं धरती तो तुम बारिश रिम-झिम हो,
मै कंप्यूटर तो तुम हार्ड-डिस्क हो,
किसी और के हो गये तो
इस दिल के लिए रिस्क हो |


तुमसे कैसे कहूँ कि तुम मेरे क्या हो !






Saturday, September 15, 2012

अन्धेरा


अन्धेरा
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
कैसा होता होगा दिन- रात , शाम या सवेरा I
भोर में चेचाह्तें पक्षी, शाम को  ले जाते होंगे अपना बसेरा I
दिन में धुप की तपिश , तो रत में चाँद का एहसास शीतल सुनेहेरा I
 

आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
जो दिखता  है मुझे हर -पल, उस अँधेरे को  कहते हैं रंग काला I
कैसे होते होंगे रंग सभी, या फूलों की गुलाबी माला,
सिर्फ कल्पना ही कर सकता है ,जिसने देखा नही कभी उजाला I
 

आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
ये चहल-पहल , हल-चल और शोर ही मुझे जीवन का एहसास करता है I
इस्थिरता, ख़ामोशी , तन्हाई और सूना सन्नाटा मुझे डराता  है I
किसी की आवाज़ और स्पर्श ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है I
कैसा होता होगा व्यक्ति का रूप आकार , कैसा दिखता  है जब वो हस्ता खिलखिलाता है I
 

आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
हज़ार ख्वाईशें उठती हैं मेरे सीने में,
यह सोचती हूँकि क्या रखा है ऐसे जीने में I
दुनिया कहती मुझे अभागी , मुझ पैर तरस खाती है ,
निभरता से लाचार ज़िन्दगी , अँधेरे में सिमट जाती है I
 

आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
माँ कहती हैं कि  बड़ा दयालू  है भगवान् I
ऐसी  कोई  समस्या  नहीं - जिसका  नहीं  समाधान  I
देख  सकती हूँ मैं  भी  गर  कोई  कर  दे  मुझे अपनी  आखें दान  I
इसी  आस  में जीती  हूँ कि कब  आएगा  वो दिन महान   I


आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I 

Sunday, May 27, 2012

मेरे जीने की आस





तू जज़्बात का वो दरिया है , जिसका कोई साहिल नहीं |
नूर-इ-रूह में बस्ता है , पर मेरी ज़िन्दगी में शामिल नहीं |
एक उफ़ सी है सीने में कि क्यूँ तू मुझे हासिल नहीं |
तकदीर के खेल कह लो या फिर शायद, मै तेरे या तू मेरे काबिल नहीं |


महफ़िल भी है , मंज़र  भी, चेहरे पर हसी , दिल बंज़र भी |
एक खामोश सैलाब, होठो पर सजी मुस्कान , आँखों में समंदर भी |
हर मौसम सर्द , बे -पनाह दर्द, घाव दीखते नहीं जो हैं अन्दर भी |
तेरी ख़ामोशी , तेरी बेरुखी के सीने में चुभते खंज़र भी |


क्यूँ है तू जुदा सा, मुझसे  यूँ खफा सा, मेरे मन का सूरज है बुझा सा |
आँखों में एक तिनका छुपा सा, तेरे बिना मेरा स्वर है रुंधा सा |
जीने में खलिश, आँखों में तपिश , जाती नहीं तुझे पाने की कशिश |
कभी दूर कभी पास , तेरे वजूद का एहसास ही है मेरे जीने की आस |
कितना भी बहला लूँ , कही भी दिल लगा लूँ , सब लगता  है बकवास |
मेरा सब कुछ तू ही है , मेरे लिए तू है सबसे अलग , सबसे ख़ास |
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जज़्बात का तू वो समन्दर, जिसका कोई साहिल नहीं |

बस्ता है नूर- ए -रूह में, पर ज़िन्दगी में शामिल नहीं |

एक उफ़ सी है सीने में कि आख़िर मुझे क्यूँ हासिल नहीं |

तकदीर का खेल है ये शायद,मै तेरे या तू काबिल नहीं |

 

 

 

महफ़िल भी है, वो मंज़र भी, चेहरे पे हँसी, दिल बंज़र भी |

सैलाब है खामोश होठों पे आँखों में उठते समंदर भी |

मौसम सर्द ,  बे -पनाह दर्द, दिखते नहीं, हैं घाव अन्दर भी |

ख़ामोशी, और तेरी बेरुखी के, है चुभते हमेशा खंज़र भी |

तकदीर का खेल है ये शायद, मै तेरे या तू काबिल नहीं |

 

क्यूँ है यूँ जुदा सा,तू मुझसे  क्यूँ है  खफा सा यूँ मुझसे |

छाया है ये घना अँधियारा, सूरज बुझा सा क्यूँ मुझसे |

आँखों में  चुभता है मेरी, तिनका छुपा है जाने कबसे |

क्यूँ कौन कब सवाल कैसे, ऐसे शिक़वे गिला हैं रब से |

तकदीर का खेल है ये शायद, मै तेरे या तू काबिल नहीं |

 

जीने में खलिश, आँखों में तपिश, जाती नहीं तुझे पाने की कशिश |

थे अपने भी कुछ हंसी सपने,पर कर रहे ग़म की परवरिश

कितना भी अब मैं बहला लूँ ,क्या और कहीं भी दिल लगा लूँ

मौसम ये आता और जाता,पर थमती नहीं मेरी बारिश

तकदीर का खेल है ये शायद, मै तेरे या तू काबिल नहीं |

 

बस्ता है नूर- ए -रूह में, पर ज़िन्दगी में शामिल नहीं |

एक उफ़ सी है सीने में कि आख़िर मुझे क्यूँ हासिल नहीं |

तकदीर का खेल है ये शायद, मै तेरे या तू काबिल नहीं |

मै तेरे या तू काबिल नही, काबिल नहीं, तू नहीं |


Saturday, January 14, 2012

Beauty with Brain






Beauty with brain is always rare,
Beauty is exotic, brain is fair.

Beauty invites multiple affair,
Brain attracts distinguished care.


Beauty has fans to follow.
For brain theres nothing tough to swallow.

Beauty gives inspiration to fantasy.
Brain has power to lead to ecstasy.

Beauty allures poet’s imagination.
Brain develops impossible creation.

Beauty can be subjective.
But Brain is always objective.

Beauty fades away with time.
Brain guides you for the whole life time.

When both join hands, just be aware.
The world is yours, nothing to spare.

Tuesday, January 10, 2012

बातें कुछ दिल की




दुनिया की भीड़ में तेरी आखों की चमक कुछ ऐसी जची ,
की बेताब दिल में एक प्यार भरी मुस्कान जा सजी I
तेरा यूँ करीब आना कुछ ऐसे दिल को भा गया ,
की मेरी रूह में तेरे एहसा का खुमार छा गया I




एक पल में तुमने हमे अपना बना लिया ,
की जैसे रात की स्याही ने काजल समां लिया I
डरता था दिल , मन में इस चिंगारी को बूझा दिया ,
अजय है तेरा प्यार , जिसने हमे खुद से मिला िया I




तेरा पास आना, तो कभी दूर जाना ,
बहुत मुश्किल था दिल को मनाना I.
कभी लगता पराया , तो कभी लगता अपना ,
तेरा साथ होना लगता एक सुनेहरा सपना I




मोहब्बत ने करवट ली , बदलते मौसम की तरह ,
बरसाने लगे प्यार तुम रिमझि सावन की तरह ,
खिची आई तेरे आहोश में चुम्बक की तरह ,
मेहेकने लगा प्यार , सुगन्धित चन्दन की तरह I


फिर जाने अनजाने, दिल में दबा राज़ खुल गया ,
तेरा मुझ पर से भरोसा और विश्वास उठ गया I
तुमसे दूर जाने के एहसास से मेरा दिल रो दिया ,
ऐसा लगा की मैंने तुम्हे मेशा के लिए खो दिया I




क्या सोचोगे तुम यह सोच के घबराती थी ,
इसलिए सारे सच बताने से कतराती थी I

तेरे सवालों का सामना करने की हिम्मत जुटा पाती थी,
इसीलिए तो हर बार मै खामो सी रह जाती थी I

माना अपने बीच फासले हैं भी ,
ऊँच नीच के सारे भेद भाव हैं सभी I
क्या तुम्हे लगी कोई कमी मेरे प्यार में कभी ,
जीत लेंगे सारा जहाँ , हम तुम साथ हो जभी I