ये बारिश की चमकती बूदें ! जैसे हो जगमगाते "मोती" !
इस रिमझिम के साज़ में ! मै तो हूँ कहीं खुद को खोती !
बौछार में भाग कर खुद को भिगोना ! तो कभी , चेहरा भिगोती !
रात बारिश के राग को सुनना ! जब सारी दुनिया सोती !
सावन की पहली बारिश ! जागती है ऐसी ख्वाईश !
की बेवजह ही खिलती हसी ! करने को कोई गुज़ारिश!
धुल देती सभी कुछ ! ऐसे की जैसे जगमगाती नुमाइश !
हरयाली झूमती हरसू ! जैसे करती हो सिफारिश !
वो मन को लुभाती ! सोंधी मिटटी की महक !
जिसमे मदहोश हो ! मन जाता है बहक !
की होने को बेक़रार ! ये कैसी है लहक !
मन में एक गुंजन ! से हम जाते हैं चहक !
काश !!!! इस बारिश में सारे गम घुल जाए,
सदियों से बंद दिलों के दरवाजे खुल जाये ,
आँचल चौधरी
