Saturday, September 18, 2010

महेंगाई




हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महँगाई |
खोया और पनीर तो 
पाव भर भी ले न सकी , 
सोनारों के तराजू से तोल्वा 
मिलीग्राम में ले कर आई I
काजू -किशमिश , 
बादाम-अखरोट लेने तो कल 
मैं बैंक से लोन ले कर आई I
क्या खाऊं आलू -बैगन ,
परवल , भिन्डी या तरोई , 
अब तो मैं सीधे 
घास -फूस पर उतर आई I
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महँगाई |
रिक्शा , ऑटो और taxi 
के भाड़ों पर भी 
महँगाई की रंगत छाई I
इस बढ़ते हुए भाड़े ने मेरे 
आने -जाने पर लगाम लगाई I
घरेलु खर्चे , अम्म्मा की दवाई , 
बीवी की फरमाईशें 
और बच्चों की पढ़ाई ,
ने एक आम आदमी 
की रातों की नींदें उड़ाई I
बचा -कूचा चैन ले जाती है 
अपने घर के लिए 
जाने वाली मासिक EMI !
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महँगाई |
मेहमानों को देख कर लगे
कि मानो संकट की घड़ी आई ,
कहाँ से लाऊँ चाय-नाश्ता
या फिर कोई छेने की मिठाई I
सप्ताहांत में क्या जाऊं 
कहीं घूमने फिरने ,
सिनेमा से मन बहलाने ,
खुद ही गुनगुना लेती हूँ चन्द गाने,
ह़र तरफ बढ़ते दामों ने 
बाजारों में है आग लगाई I
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महँगाई |
बढ़ती हुई महेंगाई,
बुंदेलखंड, विधर्भ जैसे 
अनेक प्रान्तों के किसानों 
पर भी मुसीबतें लाई |
लाखों किसानों की व्यथा 
भुकमरी, उत्तेजना उपद्रव व 
आवेश में  उभर कर आई I
दुखी, त्रस्त और क़र्ज़ में डूबे 
किसान ने ख़ुदकुशी को 
आखरी रह मान अपनी जान गवाई I
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महेंगाई I
कहने को तो शासन में 
आम आदमी की सरकार है आई ,
पर इस आम आदमी की सरकार ने
दी कमर तोड़ बढ़ती महेंगाई I
नौकरी पेशा होते हुए भी इस 
महेंगाई से मेरी सांस रुक आई ,
तो फिर एक बार सोचिये मेहरबान , 
कि गरीबों पर मेहेंगाई ने 
क्या –क्या गाज गिराई |
दोस्तों ,अपनी इस स्व-रचित कविता 
के माध्यम से मैं अपनी यही संवेदना 
आप तक प्रस्तुत करने आई, 
हम सबकी है बस एक दुहाई , जेब खाली करती पल पल बढ़ती महेंगाई I

---------आँचल चौधरी













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