यदि आज कहीं " निर्भया" बनी नारी ,
तो सोच लो , एक बार फिर,
कल कहीं इन्ही हैवानों का शिकार न हो बेटी तुम्हारी !
गर राहों और गलियों में छेड़ी जाती है नारी
तो सोच लो , कल को राह गुज़रते
इन्ही रास्तों पर न सिसकती मिले बेटी तुम्हारी !
यदि मनचले आशिक़ों का शिकार है नारी ,
तो सोच लो , किसी पथ पर ,
कैब , बस या ट्रैन में न बैठी हो बेटी तुम्हारी !
नोची जाती है वो नन्ही परी प्यारी ,
तो सोच लो , कल कोई
दरिंदा न कुचल दे गुड़िया तुम्हारी !
एसिड से कुरूप की जाती है नारी ,
तो सोच लो , कल किसी सरफिरे
के गुस्से से दागदार न हो बेटी तुम्हारी !
रिश्तों और मर्यादा को ताक पर रखते हुए ,
जब छली जाती है कोई बेचारी ,
तो सोच लो , कल को न हो वो कोई तुम्हारी !
कोख में ही मार दी जाती है दुलारी ,
तो सोच लो, कल कहीं न मिले,
किसीको भी अपने बेटे के लिए बहू रानी !
गर देह -व्यापार में जबरन झोंकी जाती है नारी ,
तो सोच लो , की कल किसी बाजार में ,
न बैची जा रही हो बेटी तुम्हारी !
यदि प्रताड़ित है परिवार में नारी ,
तो सोच लो , ऐसे ही किसी ,
परिवार की बहू न बन जाये बेटी तुम्हारी !
गर किसी दफ्तर में शोसित है नारी ,
तो सोच लो , कल उसी
कुर्सी पर न बैठी हो बेटी तुम्हारी !
झुलसती है गर दहेज़ की आग में नारी ,
तो सोच लो , कल इसी
अग्नि में न लिपटी मिले बेटी तुम्हारी !
इन शब्दों को यूँ न भूला देना ,
जागे जो ज़ज़्बात हैं यूँ ही न सूला देना ,
हमे ही बदलना है इस दूषित मानसिकता को ,
संकुचित सोच से बचाना है अस्मिता को !
उठे गर हाथ कभी तो मदद के ही हाथ हो ,
सुदृढ़ सोच , सदाचार व संस्कारों का साथ हो !
कहीं भी न फिर अन्याय की बात हो ,
कभी भी न १६ दिसंबर जैसी रात हो !!!!
न करे नारी का अपमान , न अपने आस पास होने दे ,
एक जुट हो जाये , कसी भी नारी के आत्म-विश्वास को न खोने दे !
धरोहर हैं ये हमारे समाज की ,
नीव है ये देश के विकास की ,
ऐसी विचार धारा का प्रचार करे ,
की सदा गर्व से आगे बढ़े
बेटी मेरी हो या फिर तुम्हारी !
आँचल चौधरी
तो सोच लो , एक बार फिर,
कल कहीं इन्ही हैवानों का शिकार न हो बेटी तुम्हारी !
गर राहों और गलियों में छेड़ी जाती है नारी
तो सोच लो , कल को राह गुज़रते
इन्ही रास्तों पर न सिसकती मिले बेटी तुम्हारी !
यदि मनचले आशिक़ों का शिकार है नारी ,
तो सोच लो , किसी पथ पर ,
कैब , बस या ट्रैन में न बैठी हो बेटी तुम्हारी !
नोची जाती है वो नन्ही परी प्यारी ,
तो सोच लो , कल कोई
दरिंदा न कुचल दे गुड़िया तुम्हारी !
एसिड से कुरूप की जाती है नारी ,
तो सोच लो , कल किसी सरफिरे
के गुस्से से दागदार न हो बेटी तुम्हारी !
रिश्तों और मर्यादा को ताक पर रखते हुए ,
जब छली जाती है कोई बेचारी ,
तो सोच लो , कल को न हो वो कोई तुम्हारी !
कोख में ही मार दी जाती है दुलारी ,
तो सोच लो, कल कहीं न मिले,
किसीको भी अपने बेटे के लिए बहू रानी !
गर देह -व्यापार में जबरन झोंकी जाती है नारी ,
तो सोच लो , की कल किसी बाजार में ,
न बैची जा रही हो बेटी तुम्हारी !
यदि प्रताड़ित है परिवार में नारी ,
तो सोच लो , ऐसे ही किसी ,
परिवार की बहू न बन जाये बेटी तुम्हारी !
गर किसी दफ्तर में शोसित है नारी ,
तो सोच लो , कल उसी
कुर्सी पर न बैठी हो बेटी तुम्हारी !
झुलसती है गर दहेज़ की आग में नारी ,
तो सोच लो , कल इसी
अग्नि में न लिपटी मिले बेटी तुम्हारी !
इन शब्दों को यूँ न भूला देना ,
जागे जो ज़ज़्बात हैं यूँ ही न सूला देना ,
हमे ही बदलना है इस दूषित मानसिकता को ,
संकुचित सोच से बचाना है अस्मिता को !
उठे गर हाथ कभी तो मदद के ही हाथ हो ,
सुदृढ़ सोच , सदाचार व संस्कारों का साथ हो !
कहीं भी न फिर अन्याय की बात हो ,
कभी भी न १६ दिसंबर जैसी रात हो !!!!
न करे नारी का अपमान , न अपने आस पास होने दे ,
एक जुट हो जाये , कसी भी नारी के आत्म-विश्वास को न खोने दे !
धरोहर हैं ये हमारे समाज की ,
नीव है ये देश के विकास की ,
ऐसी विचार धारा का प्रचार करे ,
की सदा गर्व से आगे बढ़े
बेटी मेरी हो या फिर तुम्हारी !
आँचल चौधरी

