Thursday, September 10, 2015

जुनून



बस यही सोच कर धूप में चलते रहो , यारों -
की धुप कितनी भी तेज़ हो ,सूखते नही  समंदर !
ज़ख्म ताज़ा रहे और घाव भर जाये ,
ज़ज़्बे की सुलगती रहे आग जो  है अपने अंदर !

अपनी परेशानियों को चुनोती की तरह लेना , यारों -
चमकते सूरज को अक्सर बादल ढक लिया करता है !
बदन पर घाव दिखा कर जो अपना पेट भरता है ,
सुना है वो मायूस भिखारी ज़ख्म भरने से डरता है !

मुस्कुरा कर देखो ये दुनिया रंगीन लगेगी ,
भीगी पलकों से आईना भी धुंधला सा नज़र आता है !
कोशिशों का काफिला मुस्कुरा के लगाना ,
भरोसा  रखो , थोड़ी  देर से ही सही,  पर  असर आता है !

किसी और से हारने का गम न रखना यारों -
अपने आप को हराने का जश्न मनाओ हर रोज़ ,
हार से डरना सबसे बड़ी हार है ,
कोशिश मत  छोड़ना वरना रह जायेगा अफ़सोस !


सवाल जवाब के फेर में मत पड़ना यारों -
जब लोग  तुम पर उंगलियां उठाये , घायल करें ज़ज़्बात से,
 उन्हें जवाब मत देना तुम कभी भी अलफ़ाज़ से ,
सारे शांत हो जायेंगे तुम्हारी तरक्की के शोर का अंदाज़ से  !

हमेशा अपने दिल की सुनो यारों -
तब भी जब तुम चल रहे हो सबसे हटके  अलग ,
तारे तो बेशुमार हैं रात के फलक में ,
पर चाँद तो अकेला ही जगमगाया करता है ,
वक़्त का तकाज़ा है , बस चलते जाओ,
तालियां भी बजेंगी उस पार से !


आँचल चौधरी



Sunday, August 9, 2015

सावन की पहली बारिश !





ये बारिश की चमकती बूदें ! जैसे हो  जगमगाते  "मोती" !
इस रिमझिम के  साज़  में ! मै तो  हूँ  कहीं खुद को खोती ! 
बौछार में भाग कर खुद को भिगोना ! तो कभी , चेहरा भिगोती ! 
रात बारिश के राग को सुनना !  जब सारी दुनिया सोती !

सावन की पहली बारिश !  जागती है ऐसी ख्वाईश ! 
की बेवजह ही खिलती हसी !  करने को कोई गुज़ारिश! 
धुल देती सभी कुछ !  ऐसे की जैसे जगमगाती नुमाइश !
हरयाली झूमती हरसू !  जैसे करती हो सिफारिश !

वो मन को लुभाती !  सोंधी मिटटी की महक !
जिसमे  मदहोश हो !   मन जाता है बहक ! 
की होने  को बेक़रार  ! ये कैसी है लहक ! 
मन में एक गुंजन !  से हम जाते हैं चहक !

काश !!!! इस बारिश में सारे गम घुल  जाए,
सदियों से बंद दिलों के दरवाजे खुल जाये ,
मैला  पड़ा  हर एक कोना धुल  जाये !!!


आँचल चौधरी

Tuesday, April 21, 2015

जब कभी लिखने बैठती हूँ



जब कभी लिखने बैठती हूँ

जब कभी लिखने बैठती हूँ तो ,
जो पैमाने में उतर जाएं , वो अलफ़ाज़ नहीं मिलते ,
जो  दिल  में कहीं दबे हैं  वो एहसास नहीं मिलते ,
खुद से कश्मकश करते ख्यालात नहीं मिलते,
या जो झकझोर के रख दे, वो हालात नहीं मिलते ।

किसी शख्स के बारे में लिखना हो तो ,
उसकी रूह को छू कर वापस  आना होता है ,
जिन गलियों का इल्म नहीं , वहां डेरा बसना होता है ,
उसकी हंसी में खिलखिलाना होता है ,
और उसके  दर्द में दिल डुबाना होता है ।

कोई अधूरी नज़्म को पूरा करते करते -
वो चाय पीते पीते स्याही को घंटो घिसते रहना ,
सिरहाने के संग उन अधूरी लाइनों को दोहराते रहना ,
रात में जागकर  कागज़ कलम को टटोलते रहना ,
या भोर में मुर्गे की बांग संग रात को अलविदा कहना  ।

किसी की आँखों को बिना कुछ बोले पढ़ते रहना ,
या फिर  कल्पना के क्षितिज में कुछ ढूंढते रहना ,
किसी महफ़िल में चुपचाप शब्दों को बुनते रहना ,
भीड़ में खोती किसी परछाई के पीछे भागते रहना ,
आधे - अधूरे से किस्सों  को कागज़ पर पूरा करना ।

लिखने का भी अपना एक मुकाम होता है -
कभी किसी सोच को एक नया आकार देना होता है ,
किसी घटना को अलग दृश्टिकोण से देखना होता है ,
अधूरे सपनो को कल्पना के पंख दे कर साकार करना होता है ,
जोश व जुनून भर दे ऐसी प्रेरणा का विचार करना होता है

आँचल चौधरी


Monday, December 15, 2014

तो सोच लो

यदि आज कहीं " निर्भया" बनी नारी ,
तो सोच लो , एक बार फिर,
कल कहीं  इन्ही हैवानों का शिकार न हो बेटी तुम्हारी  !

गर राहों और गलियों में छेड़ी जाती है नारी
तो सोच लो , कल को राह गुज़रते
इन्ही रास्तों पर न सिसकती मिले बेटी तुम्हारी !

यदि मनचले आशिक़ों का शिकार है नारी ,
तो सोच लो , किसी पथ पर ,
कैब , बस या ट्रैन में न बैठी हो बेटी तुम्हारी !

नोची जाती है वो नन्ही परी प्यारी ,
तो सोच लो , कल कोई
दरिंदा न कुचल दे गुड़िया तुम्हारी !

एसिड से कुरूप की जाती है नारी ,
तो सोच लो , कल किसी सरफिरे
के गुस्से से दागदार न हो बेटी तुम्हारी !


रिश्तों और मर्यादा को ताक पर रखते हुए ,
जब छली जाती है कोई बेचारी ,
तो सोच लो , कल को  न हो  वो कोई तुम्हारी  !

कोख में ही मार दी जाती है दुलारी ,
तो सोच लो, कल कहीं न मिले,
 किसीको भी अपने  बेटे के लिए बहू रानी !


 गर देह -व्यापार में  जबरन  झोंकी जाती है नारी ,
तो सोच लो , की कल किसी  बाजार में ,
न बैची जा  रही हो बेटी तुम्हारी  !


यदि प्रताड़ित है परिवार में   नारी ,
तो सोच लो , ऐसे ही किसी ,
परिवार की बहू  न बन जाये बेटी तुम्हारी !

गर  किसी दफ्तर में शोसित है नारी ,
तो सोच लो , कल उसी
कुर्सी पर न बैठी हो बेटी तुम्हारी !
 

झुलसती है गर दहेज़ की आग में नारी ,
तो सोच लो , कल इसी
अग्नि में न लिपटी मिले बेटी तुम्हारी !

इन शब्दों को  यूँ न भूला देना ,
जागे जो ज़ज़्बात हैं यूँ ही न  सूला देना ,

हमे ही बदलना है इस दूषित मानसिकता को ,
संकुचित सोच से  बचाना है अस्मिता को !



उठे गर हाथ कभी तो  मदद के ही हाथ  हो ,
सुदृढ़ सोच , सदाचार व  संस्कारों का साथ हो !

कहीं  भी न फिर अन्याय की बात हो ,
कभी भी न १६ दिसंबर जैसी रात हो !!!!

न करे नारी का अपमान , न अपने आस पास होने दे ,
 एक जुट हो जाये , कसी भी नारी के आत्म-विश्वास को न  खोने दे !


धरोहर हैं ये हमारे समाज की ,
नीव है ये देश के विकास की ,
ऐसी विचार धारा  का प्रचार करे ,
की सदा गर्व  से आगे बढ़े
बेटी मेरी हो या फिर तुम्हारी !

आँचल चौधरी

Tuesday, September 16, 2014

यूं ही ना जाने दो

                               
                                 “यूं ही ना जाने दो “
आने वाले कल की फिक्र और बीते हुए कल के अफ्सोस में, तुम अपने आज को यूं ही ना जाने दो ।
किसी खास को पाने की ललक में, अपने आज के साथीयों की अवहेलना कर, उन्हे अपने से दूर ना जाने दो ।
कोई बड़ी उपलबधी पाने की अभिलाशा में, तुम जीवन की छोटी छोटी खुशिययों को ना जाने दो ।
अपनों के वात्सलय व स्नेह बरसाने की वो हर छोटी बड़ी कोशिश को, यूं क्रतज्ञहीन बन नज़रं-अंदाज़ं ना जाने दो ।

रोज़-मररा की भाग में दौड़ में, सर्प्रथम रहने की होड़ में, फुर्सत के चंद लम्हों को ना जाने दो ।
प्रति-स्पर्धा के इस दौर में ,छल –छ्लावे के ज़ोर में, अपनी अमिट मुस्कान को चेहरे से  ना जाने दो ।
बाहर की आंधी और तूफानों के झोंकों से झुंझलाकर, अपने अंदर के संयम को ना जाने दो ।
झूठ, फरेब और धोखे का इस्तेमाल तो दूसरों के हाथ में है, पर खुद के ज़मीर् को ना जाने दो ।

कितने ही सफल व समरिध्द हो जाओ ज़िंदगी में मेरे दोस्त, अपने मधुर व्यव्हार व सओम्य्ता को ना जाने दो ।
जीत-हार तो मानो दिन –रात की तरह आते रेहेंगे, बेहतर बनने के लिये हार से मिले अनुभव को ना जाने दो ।
तुम कल हारे,बार-बार हारे,हर बार हारे तो क्या, फिर से एक बार कोशिश करने के होसले का ना जाने दो ।
दरवाजे-दर- दरवाजे बंद मिले तो कोई बात नही राहगीर, नये उत्साह से दस्तक देने की उम्मीद को ना जाने दो ।

इस दुनिया में सब कुछ ठीक नही है,प्रयत्न्शील बन एक बेहतर विरासत छोड़् के जाने के विचार को ना जाने दो ।
सोते हुए सपने तो रोज़ ही देखते हैं,अथक परिश्रम कर, अपने सपनों को खाली ना जाने दो ।
नि:संदेह चूनौतीयों से भरा है जीवन, निरंतर आगे बढाते रहो अपने कदम ।
चूनौतीयों को चूनौती देते हुए समय के प्रवाह संग बह जाओ तुम ,
मायूस हो कर तुम कभी भी अपने आत्म-विश्वास को ना जाने दो । 



आँचल चौधरी

Wednesday, August 28, 2013

कहाँ हो दोस्त



कहाँ हो दोस्त , की अब आ भी जाओ,
तपती धुप में बादल बन छा भी जाओ ,
गूंगी सी ज़िन्दगी में एक गीत गा भी जाओ ,
पत्थर हो चुकी इन सुनी आंखों को रुला भी जाओ ।

कहाँ हो दोस्त, की अब तुम कुछ  तो बोलो ,
पास आ कर आँचल की छाँव में सो लो ,
अगर तुम्हें कोई गम हो तो मेरे पास आकर रो लो ,
प्यार के जो ख्वाब छुपा रखे हैं उन्हें अब तो खोलो ,

कहाँ हो दोस्त कि अब लगता नहीं दिल ,
तू कैसा भी , कहीं भी है मुझसे आकर मिल ,
तेरे दूर जाने से मेरी पूरी दुनिया गयी है हिल ,
टूट जाये न साँसों की डोर, इसे  अपने बन्धन से दो सिल ,

कहाँ हो दोस्त कि अब डर लगने लगा है ,
हज़ारों की भीड़ में भी हर शख्स  बेगाना लगने लगा है ,
हर किसी से  इख्तियार- एतबार हटने लगा है ,
कैसे सोउं रातों में कि हर इन्सान जगने लगा है !

कहाँ हो दोस्त , की अब आ भी जाओ |

कभी जाने अनजाने




कभी जाने  अनजाने , वो  किस्से  पुराने ,
यू हीं ज़हन  में आ  जाते  हैं  सताने ,
ले  कर  अपने साथ मुस्कुराने  के बहाने  ,
 खट्टी -मीठी  यादों  के अनमोल  खजाने  |


कभी जाने  अनजाने , वो  किस्से  पुराने ,
किसी बेबाक शाम , चाय की चुस्कियों में डूब जाने ,
ज़रूरतों- ज़िम्मेदारियों  के बोझ तले , वो कहीं खोते यारों के घराने  ,
कभी दोस्तों के संग गाया करते थे , अपनी दोस्ती  के  तराने ,
फिर  से  उसी  मोड या  नुक्कड़ से गुजरने पर , पुरानी  बातों के  पयमाने ।

कभी जाने  अनजाने  , वो  किस्से  पुराने ,
सदियों से बंद पड़े कोने में , समय की परत  हटाने ,
वो  चुप-चाप खामोशी से ख्वाब में खोते फ़साने ,
कभी इतेफ़ाक़  से, बस ऐसे ही  अपने  आप  को दोहराने ,
एक  दबे हुए एहसास को जिन्दा करते, लोहबान की भांति सुलगाने ।

कभी जाने  अनजाने  , वो  किस्से  पुराने ,
तेरे दूर होने पर भी , तेरे होने का इल्म कराने  ,
आज भी वो शामिल हैं , चाहे बीते कितने ही ज़माने ,
किसी और में तेरी छवि  देख कर , एक पल को रुक जाने ,
किसी अपने की  याद में नयनों से रिमझिम बरसाने |

कभी जाने  अनजाने  , वो  किस्से  पुराने,
तनहाईयों को तनहा करते , गुदगुदाने हसाने ,
रुखी रोती रुसवाईयों में , रूठे दिल को मनाने ,
अकेलेपन को चीरते , निराश मन को समझाने ,
अँधेरे मन  में प्रेरणा रूपी दिया जलाने  |

कभी जाने  अनजाने  , वो  किस्से  पुराने,
गलतियों और  उपलब्धियों  के द्वारा  सक्षम  बनाने ,
घटनाओं के चक्र से परिपक्वता  बढ़ाने ,
आज की परेशानियों को तजुर्बे  से सुलझाने ,
अनुभव को बढ़ाते , थोड़ा और समझदार बनाने |

कभी जाने  अनजाने  , वो  किस्से  पुराने ,
यू हीं ज़हन  में आ  जाते  हैं  सताने ,
ले  कर  अपने साथ मुस्कुराने  के बहाने  ,
अच्छे - बुरे , खट्टे - मीठे  यादों  के अनमोल  खजाने  |


आँचल चौधरी