Sunday, August 9, 2015

सावन की पहली बारिश !





ये बारिश की चमकती बूदें ! जैसे हो  जगमगाते  "मोती" !
इस रिमझिम के  साज़  में ! मै तो  हूँ  कहीं खुद को खोती ! 
बौछार में भाग कर खुद को भिगोना ! तो कभी , चेहरा भिगोती ! 
रात बारिश के राग को सुनना !  जब सारी दुनिया सोती !

सावन की पहली बारिश !  जागती है ऐसी ख्वाईश ! 
की बेवजह ही खिलती हसी !  करने को कोई गुज़ारिश! 
धुल देती सभी कुछ !  ऐसे की जैसे जगमगाती नुमाइश !
हरयाली झूमती हरसू !  जैसे करती हो सिफारिश !

वो मन को लुभाती !  सोंधी मिटटी की महक !
जिसमे  मदहोश हो !   मन जाता है बहक ! 
की होने  को बेक़रार  ! ये कैसी है लहक ! 
मन में एक गुंजन !  से हम जाते हैं चहक !

काश !!!! इस बारिश में सारे गम घुल  जाए,
सदियों से बंद दिलों के दरवाजे खुल जाये ,
मैला  पड़ा  हर एक कोना धुल  जाये !!!


आँचल चौधरी

No comments: