Wednesday, August 28, 2013

कहाँ हो दोस्त



कहाँ हो दोस्त , की अब आ भी जाओ,
तपती धुप में बादल बन छा भी जाओ ,
गूंगी सी ज़िन्दगी में एक गीत गा भी जाओ ,
पत्थर हो चुकी इन सुनी आंखों को रुला भी जाओ ।

कहाँ हो दोस्त, की अब तुम कुछ  तो बोलो ,
पास आ कर आँचल की छाँव में सो लो ,
अगर तुम्हें कोई गम हो तो मेरे पास आकर रो लो ,
प्यार के जो ख्वाब छुपा रखे हैं उन्हें अब तो खोलो ,

कहाँ हो दोस्त कि अब लगता नहीं दिल ,
तू कैसा भी , कहीं भी है मुझसे आकर मिल ,
तेरे दूर जाने से मेरी पूरी दुनिया गयी है हिल ,
टूट जाये न साँसों की डोर, इसे  अपने बन्धन से दो सिल ,

कहाँ हो दोस्त कि अब डर लगने लगा है ,
हज़ारों की भीड़ में भी हर शख्स  बेगाना लगने लगा है ,
हर किसी से  इख्तियार- एतबार हटने लगा है ,
कैसे सोउं रातों में कि हर इन्सान जगने लगा है !

कहाँ हो दोस्त , की अब आ भी जाओ |

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