एक तरफ मेरे सपने मुझे सोने नहीं देते,
फौलाद से मेरे इरादे मुझे रोने नहीं देते |
लक्ष्य की दूरियां मुझे अब जीने नहीं देती ,
यह ख्वाईशें अब ज़हर भी पीने नहीं देती |
कब तक यूं रस्मों और रिवाज़ों से लड़ती
रहूं मेरे "मालिक ",
रोज़ अर्ज़ियाँ डाली है -" बंगला साहिब ",
"मक्का" व "शिवालिक " |
आखों से आँसूं छलकने को बेताब बैठे हैं ,
पर उम्मीद हम अपने आप से लगाएं बैठे हैं |
थोड़ा सा बस और चल लूँ तो शायद सहर हो जाये ,
एक मुस्कराहट से मेरी तकलीफों पर कहर हो जाये |
रातों को नींद अब अलविदा कर देती हैं,
अथक आशायें फिर भी उठ, चलने देती हैं |
कोई शिरकत तो करे ख़्वाबों की महफ़िल में,
दुआयें शामिल कर लेंगी उन्हें अपनी मंज़िल में |
सिर्फ औपचारिकता में क़ैद होना तो नहीं है ज़िन्दगी,
हो उद्देश्य जीने का, तो जीवन हो जैसे -"खुदा की बंदगी" |
आँचल चौधरी
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