Tuesday, April 21, 2015

जब कभी लिखने बैठती हूँ



जब कभी लिखने बैठती हूँ

जब कभी लिखने बैठती हूँ तो ,
जो पैमाने में उतर जाएं , वो अलफ़ाज़ नहीं मिलते ,
जो  दिल  में कहीं दबे हैं  वो एहसास नहीं मिलते ,
खुद से कश्मकश करते ख्यालात नहीं मिलते,
या जो झकझोर के रख दे, वो हालात नहीं मिलते ।

किसी शख्स के बारे में लिखना हो तो ,
उसकी रूह को छू कर वापस  आना होता है ,
जिन गलियों का इल्म नहीं , वहां डेरा बसना होता है ,
उसकी हंसी में खिलखिलाना होता है ,
और उसके  दर्द में दिल डुबाना होता है ।

कोई अधूरी नज़्म को पूरा करते करते -
वो चाय पीते पीते स्याही को घंटो घिसते रहना ,
सिरहाने के संग उन अधूरी लाइनों को दोहराते रहना ,
रात में जागकर  कागज़ कलम को टटोलते रहना ,
या भोर में मुर्गे की बांग संग रात को अलविदा कहना  ।

किसी की आँखों को बिना कुछ बोले पढ़ते रहना ,
या फिर  कल्पना के क्षितिज में कुछ ढूंढते रहना ,
किसी महफ़िल में चुपचाप शब्दों को बुनते रहना ,
भीड़ में खोती किसी परछाई के पीछे भागते रहना ,
आधे - अधूरे से किस्सों  को कागज़ पर पूरा करना ।

लिखने का भी अपना एक मुकाम होता है -
कभी किसी सोच को एक नया आकार देना होता है ,
किसी घटना को अलग दृश्टिकोण से देखना होता है ,
अधूरे सपनो को कल्पना के पंख दे कर साकार करना होता है ,
जोश व जुनून भर दे ऐसी प्रेरणा का विचार करना होता है

आँचल चौधरी