एक पल ज़रा ठहर कर के तो देखो
बादलों के संग हवाई यात्रा में ऊँची उड़ान की गश्त ,
कभी रेलवे की खिड़की से चाँद से गुफ्तगूँ कर के तो देखो |
हाईवे पर हवा को चीरती रफ़्तार से तो बहुत उड़े होगे ,
कभी कच्ची सड़क पर लुढकते हुए टेढ़े मेढ़े चल कर के तो देखो ।
कीचड़ से भरे गढ्ढे में उछलती कार ,
इस चलते फिरते झूले में सफ़र कर के तो देखो ।
कभी रुक के चलते तो कभी चल के रुकते ठहराव सरीखी ज़िन्दगी ,
बचपन की याद दिलाते , इस उड़न -खटोले में झूला झूल करके तो देखो
आठ लेन में गति की सीमाएं तोड़ते , घण्टों को मिनटों , मिनटों को क्षणों में खूब बदला होगा,
कभी एक लेन में आने वाली एक ही कतार के पीछे , इंतज़ार कर के तो देखो ।
एक दुसरे से पास लेती चमचमाती गाड़ियों में मशीन बन चुके चालक तो रोज़ ही मिल जाते हैं ,
कभी खडंजे में खेलते मासूम चेहरों के साथ मुस्कुरा कर के तो देखो ।
खिड़की के झरोखों से झाकती आँखें , ऊँची इमारतों से टकरा कर ठहर जाती हैं ,
कभी लहलहाते खेतों से घीरे छप्पर , इठलाती नहर की गोद में डूबते सूरज का नज़ारा केर के तो देखो ।
अंग्रेजी -हिंदी फ़िल्मी धुनों पर तो रोज़ ही झूमते होगे ,
कभी कोयल के गीत में , झींगुर का रैप सुन कर के तो देखो ।
दिखावे से भरी शहरी बोली, कोटी कोटी में छुपी स्वार्थी मीठास ,
कभी गाँव की मीठी भोजपुरी सुन कर के तो देखो ।
शहरी चका - चोंध, भाग -दौड़ में खोती इन्सानियत ,
कभी गाँव के गरीब किसान का अमीर दिल आजमां कर के तो देखो ।
एक पल ज़रा ठहर कर के तो देखो |
एक पल ज़रा ठहर कर के तो देखो |
आँचल चौधरी

2 comments:
very nice
good one but it seems a deep sadness inside, which will be coming out from this poem, keep it up.
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