आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा
I
कैसा होता होगा दिन- रात
, शाम या सवेरा
I
भोर में चेचाह्तें पक्षी,
शाम को
ले जाते होंगे अपना बसेरा
I
दिन में धुप की तपिश
, तो रत में चाँद का एहसास शीतल सुनेहेरा
I
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा
I
जो दिखता है
मुझे हर -पल,
उस अँधेरे
को
कहते हैं रंग काला
I
कैसे होते होंगे रंग सभी,
या फूलों की गुलाबी माला,
सिर्फ कल्पना ही कर सकता है
,जिसने देखा नही कभी उजाला
I
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा
I
ये चहल-पहल
, हल-चल और शोर ही मुझे जीवन का एहसास करता है
I
इस्थिरता,
ख़ामोशी
, तन्हाई और सूना सन्नाटा मुझे डराता है
I
किसी की आवाज़ और स्पर्श ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है
I
कैसा होता होगा व्यक्ति का रूप आकार
, कैसा दिखता
है जब वो हस्ता खिलखिलाता है
I
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा
I
हज़ार ख्वाईशें उठती हैं मेरे सीने में,
यह सोचती हूँ, कि क्या
रखा है ऐसे जीने में I
दुनिया कहती मुझे अभागी , मुझ पैर तरस खाती है
,
निभरता से लाचार ज़िन्दगी
, अँधेरे में सिमट जाती है
I
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा
I
माँ कहती हैं कि
बड़ा दयालू है भगवान्
I
ऐसी
कोई
समस्या
नहीं -
जिसका
नहीं
समाधान I
देख
सकती हूँ
मैं
भी
गर
कोई कर
दे मुझे
अपनी
आखें दान I
इसी आस
में जीती
हूँ कि
कब
आएगा
वो दिन महान
Iआँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा I
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा I

No comments:
Post a Comment