Saturday, September 15, 2012

अन्धेरा


अन्धेरा
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
कैसा होता होगा दिन- रात , शाम या सवेरा I
भोर में चेचाह्तें पक्षी, शाम को  ले जाते होंगे अपना बसेरा I
दिन में धुप की तपिश , तो रत में चाँद का एहसास शीतल सुनेहेरा I
 

आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
जो दिखता  है मुझे हर -पल, उस अँधेरे को  कहते हैं रंग काला I
कैसे होते होंगे रंग सभी, या फूलों की गुलाबी माला,
सिर्फ कल्पना ही कर सकता है ,जिसने देखा नही कभी उजाला I
 

आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
ये चहल-पहल , हल-चल और शोर ही मुझे जीवन का एहसास करता है I
इस्थिरता, ख़ामोशी , तन्हाई और सूना सन्नाटा मुझे डराता  है I
किसी की आवाज़ और स्पर्श ही उसकी पहचान बन कर रह जाता है I
कैसा होता होगा व्यक्ति का रूप आकार , कैसा दिखता  है जब वो हस्ता खिलखिलाता है I
 

आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
हज़ार ख्वाईशें उठती हैं मेरे सीने में,
यह सोचती हूँकि क्या रखा है ऐसे जीने में I
दुनिया कहती मुझे अभागी , मुझ पैर तरस खाती है ,
निभरता से लाचार ज़िन्दगी , अँधेरे में सिमट जाती है I
 

आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
माँ कहती हैं कि  बड़ा दयालू  है भगवान् I
ऐसी  कोई  समस्या  नहीं - जिसका  नहीं  समाधान  I
देख  सकती हूँ मैं  भी  गर  कोई  कर  दे  मुझे अपनी  आखें दान  I
इसी  आस  में जीती  हूँ कि कब  आएगा  वो दिन महान   I


आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I
आँखों में छाया रहता है घन घोर अन्धेरा  I 

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