सागर में जो सैलाब आये तो तुम कहीं डर न जाना,
अपने आँचल में चुपा लुंगी तुम्हे
ऊंचायिओं से जो मंजिल ना दिखे तो तुम कहीं रुक ना जाना ,
अपनी आंखों से मंजिल का नजारा करा दूंगी तुम्हे
दुशमनों की नज़रें थाम ले तुम्हे तो तुम कहीं डर ना जाना ,
अपने काजल का टीका लगा दूंगी तुम्हे
हस्राते पूरी ना हो तो तुम मायूस हो naa jana ,
अपनी doooaon के phoolon से saja दूंगी तुम्हे
1 comment:
Rightly describes you ... keep it up :-)
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